रविवार, 9 मई 2010

कुछ बीती बिस्म्रित बातें

मानस सागर के तट पर ,
ये तेज लहर की घातें |
कल कल ध्वनि से हैं कहती,
कुछ बीती बिस्म्रित बातें |

मधुमय मादक मुस्कान लिए ,
जब पहले देखा तुमको |
जन्मो का है साथ तुम्हारा,
ये लगा उसी क्षण मुझको |

मैं अपलक इन नयनो से ,
देखा करता उस छवि को |
जैसे सूर्यमुखी का पौधा,
देखा करता है रवि को |

कौंध दामिनी सी स्मृतिया , उर में आग लगा जाती हैं

कौंध दामिनी सी स्मृतिया , उर में आग लगा जाती हैं .
सम्मोहन स्वर मन में उभरे , बिरह मेघ जगा जाती हैं.
बिरह मेघ की बूंदों से नयन जलज हो जाते हैं.
सुन्या स्रादिस्य सूखे हृद्यांगन भावों से भर जाते हैं.
भाव भरे जब अंतर्मन में , मन पुलकित हो आह्लाद करे.
शुन्य मिलन हो आज प्रिये , ना अधरों पर अवसाद रहे.
भावभरी उस प्रेम सुधा का , हर पल हर छन पान करे.
कर आलिंगनबद्ध प्रतिग्या , आत्ममिलन का ग्यान करें.
हृदय तुम्हें देती हूँ प्रियतम , बंध कर हृदय मुक्त होते हैं.
देह नहीं है परिधि प्रणय की , दीव्य प्रणय उन्मुक्त होते हैं.

रविवार, 2 अगस्त 2009

मित्र तुम्हारे निकट खडा मैं

दोस्तो मैने ये कविता बहुत पहले लिखी थी. मैने इसे जब ब्लोग सुरु किया था तब मैने इसे डाली थी मैं फिर से प्रस्तुत कर रहा हूं क्रिपया अपने विचार व्यक्त करें.

अंतर्मन का अंतर्द्वंद , या अंतर्मन की व्याकुलता !
अंतर्मन करता क्रंदन , या अंतर्मन की आतुरता !

अश्रुहीन अब नेत्र बने , वह पुष्प ह्रदय अब कुम्हलाया !
निस्तेज हुआ वह मुखमंडल , रहती उस पर क़ालि छाया !

तन कृ्शकाय हुआ जाता , मन विचलित हो डूब रहा !
ह्रदय विदीर्ण व्यंग वाणों से , वाणी का रस छूट रहा !

अंतर्मन अब ऐसी ब्यथा को अंतहीन सा पता है,
पाता खुद को अब लक्ष्य्हीन हो दिशाहीन घबराता है !

दिग्भ्रमित हुआ अब अंतर्मन , वह अंतर्कन में टूट रहा !
वह जूझ रहा अंतर्मन से , वह अंतर्मन से पूछ रहा !

वह पूछ रहा अंतर्मन से , तुम क्यों इतने अवसादग्रस्त ,
जब मित्रो का है साथ तुम्हें और मित्र तुम्हारे सिद्धहस्त!

मित्र सुधा हो जीवन में , तब अंतर्मन आह्लाद करे !
पुलकित हो वह नृत्य करे , न लेशमात्र अवसाद रहे !

मित्र तुम्हारे निकट खडा मैं, व्याकुल हूँ करता क्रंदन !
मित्र सुधा की बूँद पिला , अब शांत करो ये अंतर्मन. !

शनिवार, 1 अगस्त 2009

खाली प्याला धुंधला दर्पण

खाली प्याला धुंधला दर्पण

मन में एक अजब सी उदासी
मेरी आँखें कब से प्यासी
कैसा तेरा है ये समर्पण

खाली प्याला धुंधला दर्पण

कब से चाहूं तुझसे मिलना
मेरे दिल का दिल में जलना
कैस ये सावन का पतझड

खाली प्याला धुंधला दर्पण

चली गयी तु झलक दिखाकर
मेरे दिल में आग लगाकर
तेरा कैसा ये आकर्षँण

खाली प्याला धुंधला दर्पण

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