बुधवार, 4 मई 2016

सब संघी पापी होते है ......



आजकल संघी होना पाप हो गया है । किसी विचारधारा से जुड़ना या उसे मानना मेरा अपना निजी फैसला है पर मिडीया मे संघी मतलब पापी है हो गया है ।पर कुछ भी कहिये ,  संघ आज भी विश्व का सबसे बड़ा संगठन है जो लोगो कि सेवा निष्काम भाव से कर रहा है पर नक्सलियो द्वारा जब हमारे सैनिक मारे जाते है ये चिरकुट वामपंथी जश्न मनाते है तब यही  मिडीया इन्हे बुद्धिजीवी बताती है।
 सच तो यह है कि देश में आज एक अजीब सी नौटंकी चल रही है. साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर लोगों का जम कर बेवकूफ बनाया जा रहा है। वास्तव में यह सोचने की बात है कि हमें हमारे देश में रहने के लिए वो भाषा बोलनी पड़ती है जो तथाकथित धर्मनिर्पेक्षता की भाषा है... आज 67 वर्षों के बाद इस देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों के नाम पर राजनैतिक रोटियां सेकीं जा रही हैं...चलिए मान लेते हैं कि मुसलमान देश में अल्पसंख्यक हैं...लेकिन इसी देश में कश्मीर एक ऐसी जगह है जहां हिन्दू अल्पसंख्यक था...जब उसको कश्मीर से निकाला जा रहा था तो किसी बुद्धिजीवी ने इस बारे में तो आवाज नही उठाई...आज वो हिन्दू कहां है किस हाल में हैं क्या किसी की जानने की इच्छा होती है...पता नही. घर में किसी भी बच्चे को क्या आप घर की कीमत पर मनमानी करने देते हैं...बात संख्या की नही है... समानता की होनी चाहिए... किसी भी तरह से किसी को भी अगर आप छूट देते हैं तो मान कर चलिए कभी भी दूरियां समाप्त नही होंगी. वोट बैंक के चलते नेताओ ने देश को छोटे छोटे टुकड़ों में बांट रखा है...कोई तो ऐसा प्रयास करे की ये संख्या की गिनती बंद हो...अब तो जाति के आधार पर जनगणना होनी की बात करने लगे हैं ये लोग.... क्या ये समाज को एक बार फिर तोड़ने की साजिश नही की जा रही है... गांधी की भी ज़रूरत है इस देश को...सावरकर की भी... कहीं ऐसा न हो गांधी के नाम पर राजनीति कर रहे लोग देश के गौरवशाली इतिहास से जुड़े अन्य लोगों के बलिदान को धीरे धीरे इतिहास के पन्नों से मिटा दे...कंग्रेसी चाहते हैं कि नेहरू और गांधी नाम से इतनी योजनाएं चलाई जाएं और इतनी जगहों के नाम उन पर रखे जाएं कि अगले युग में जब इतिहास जानने के लिए खुदाई हो तो उन्हीं के नाम के स्मारक निकलें। और तब यह शोध का विषय बने कि पता करो इन गांधी और नेहरू राजवंशों का साम्राज्य कहां तक था। इस देश के बुद्धिजीवियों पर मुझे तरस आता है कि उनकी कलम केवल आरएसएस के खिलाफ ही आग उगलती है। क्या राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू से बड़े या समकक्ष महापुरुष इस देश में हुए ही नहीं क्या? क्या गांधी परिवार का त्याग भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव से भी बड़ा था?

अब एक नजर संघ की तरफ डालें। चूंकि संघ छपास का शौकीन नहीं है, इसलिए वह अपनी गतिविधियों का प्रचार-प्रसार नहीं करता। इसी का फायदा उठाकर कांग्रेसी नेता संघ के बारे में गलत प्रचार करते रहते हैं। आपकी तरह मैंने भी कभी संघ की विधिवत सदस्यता नहीं ली और न ही कोई शाखा में उपस्थित रहा, लेकिन संघ के कुछ कार्यक्रमों के कवरेज के दौरान उसकी शिक्षा से रूबरू हुआ हूं। संघ अपनी शाखा में स्वयंसेवकों को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सारा कार्य अपने हाथ से करना सिखाता है। वह भारतीय संस्कृति को अपनाने की सीख देता है। इसलिए कांग्रेसियों को बुरा लगता है, क्योंकि कांग्रेसी तो शुरू से ही विदेशियों के चम्मच रहे हैं और आज भी विदेशी की ही गुलामी कर रहे हैं।
कहने को कांग्रेस देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल है, लेकिन उसमें राष्ट्रीय नेतृत्व लायक एक भी नेता नहीं है। वह तो आतंकवादियों को फांसी से बचाना ही अपना मूल धर्म मानती है।

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सोमवार, 2 मई 2016

बरसों के बाद उसी सूने आँगन में - धर्मवीर भारती




बरसों के बाद उसी सूने आँगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना
रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना
मन का कोना-कोना

कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर बाँहों में खो जाना
अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी
फिर गहरा सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,
कँपना, बेबस हो गिर जाना

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना
मन को कोना-कोना
बरसों के बाद उसी सूने से आंगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना !
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अनूठी बातें -- अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’



जो बहुत बनते हैं उनके पास से,
चाह होती है कि कैसे टलें।
जो मिलें जी खोलकर उनके यहाँ
चाहता है कि सर के बल चलें॥
और की खोट देखती बेला,
टकटकी लोग बाँध लेते हैं।
पर कसर देखते समय अपनी,
बेतरह आँख मूँद लेते हैं॥

तुम भली चाल सीख लो चलना,
और भलाई करो भले जो हो।
धूल में मत बटा करो रस्सी,
आँख में धूल ड़ालते क्यों हो॥

सध सकेगा काम तब कैसे भला,
हम करेंगे साधने में जब कसर?
काम आयेंगी नहीं चालाकियाँ
जब करेंगे काम आँखें बंद कर॥

खिल उठें देख चापलूसों को,
देख बेलौस को कुढे आँखें।
क्या भला हम बिगड़ न जायेंगे,
जब हमारी बिगड़ गयी आँखें॥

तब टले तो हम कहीं से क्या टले,
डाँट बतलाकर अगर टाला गया।
तो लगेगी हाँथ मलने आबरू
हाँथ गरदन पर अगर ड़ाला गया॥

है सदा काम ढंग से निकला
काम बेढंगापन न देगा कर।
चाह रख कर किसी भलाई की।
क्यों भला हो सवार गर्दन पर॥

बेहयाई, बहक, बनावट नें,
कस किसे नहीं दिया शिकंजे में।
हित-ललक से भरी लगावट ने,
कर लिया है किसी ने पंजे में॥

फल बहुत ही दूर छाया कुछ नहीं
क्यों भला हम इस तरह के ताड़ हों?
आदमी हों और हों हित से भरे,
क्यों न मूठी भर हमारे हाड़ हों॥

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रविवार, 1 मई 2016

कहै कबीर सुनौ ये भोला...............





सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज के सर्वे के अनुसार इस देश मे 70% लोगो का मानना है कि मोदी को अगले 5 सालों के लिये और प्रधानमंत्री रहना चाहीये और इन्हे दुसरी बार चुना जाना चाहिये। यह सर्वे तब आया है जब  ये प्रचारित किया जा रहा था कि मोदी जी कि लोकप्रियता कम हो रही है , जबकि सच ये है कि 62% लोग मोदी जी के काम से संतुष्ट है और 70% लोग उन्हे दुबारा प्रधानमंत्री देखना चाहते है।

हालाकि कुछ लोगो का ये भी मानना है कि मोदी जी  ने अपने वादो को पुरा नही किया और स्थिति और खराब हुयी है।

अपने दत्तक पुत्रों द्वारा मोदी जी कि छवि खराब करने मे लगे आपियों, वामियो खॉग्रेसियो के लिये यह बुरी खबर है । कुछ तो बेचारे 2002 से ही लगे हैं । इन लोगो ने मोदी जी को हत्यारा तक बोला, अवार्ड वापसी गैंग ने असहिस्णुता कि नौटंकी चलायी , अखलॉक और रोहित वेमुल्ला के मृत शरीर पर भी राजनीति करने से बाज नही आये , इशरत को अपनी बेटी बना कर सड़को पर बैठ अपनी छाती कूटी , और अब आजकल कॉम-रेड कन्हैया के कन्धे से बन्दूक चला रहे हैं । ये कथित बुद्धिजीवी इतना भी नहीं समझते कि शेर पर कुत्तो के भौकने से कोइ फर्क नहीं पड़ता । हमारी तरफ एक कहावत है " कहै कबीर सुनौ ये भोला, कुतिया के त पिल्ला हि होला...." तो चाहे जितनी कोशिश कर लिजिये जनाब कुछ नही होगा........

मोदी जी देश की नब्ज पहचानते है । 17-18 घन्टे काम करने वाला देश का यह सेवक , भारत को विश्व गुरू बनाकर ही रूकेगा ऐसा मेरा विश्वास है ।


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शनिवार, 30 अप्रैल 2016

लो दिन बीता लो रात गयी -- हरिवंशराय बच्चन

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था
दिन में होगी कुछ बात नई
लो दिन बीता, लो रात गई

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फ़ैले,
सौ रजनी सी वह रजनी थी,
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई

चिडियाँ चहकी, कलियाँ महकी,
पूरब से फ़िर सूरज निकला,
जैसे होती थी, सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रात: कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

वामपंथी विचारधारा -- एक बौद्धिक आतंकवाद





वामपंथी विचारधारा एक बौद्धिक आतंकवाद है और इनका अस्तित्व तभी तक है जब तक ये व्यवस्था में नीति निर्धारण में है ।  देश में लगातार अपना जनाधार खोने के कारन वामपंथी बौखला गया है जिसका परिणाम असहिष्णुता , अवार्ड वापसी, अफजल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल जिन्दा है के रूप में देखने को मिला । JNU  यूनिवर्सिटी इनका गढ़ है और जब इनके गढ़ में राष्ट्रवादी घुस आये है तो ये बौखलाए बौखलाए बौखलाए घूम रहे है और हर दिन एक नया प्रोपोगंडा रच के विषय से ध्यान हटाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है । हालाँकि ऐसा नहीं है की JNU  में ऐसी घटनाएं पहली बार हुयी हो इससे पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएं हो चुकी है। 
जैसे की कैंपस में भारत - पकिस्तान मुशायरे में भारत विरोधी बातों का विरोध करने पर वामपंथियों द्वारा सैनिकों की पिटाई कर दी जाती है। दंतेवाड़ा में जब सैनिक शहीद होते है तो ये जश्न मानते है । महिसासुर दिवस मानते है और माँ दुर्गा को सेक्स वर्कर तक घोसित कर देते है । यह एक तरह का बौद्धिक आतंकवाद है
। इस प्रकार लगातार ये देश विरोधी और धार्मिक भावनाओ को भड़काने वाली गतिविधियाँ करते रहे थे पर इस बार देश ने इन्हें रंगे हांथो पकड़ लिया । आजतक वामपंथियों ने इसी के कारण आरएसएस को हासिये पर रख रखा था पर अब ऐसा नहीं है लेकिन अब ऐसा नहीं है , अब आमजनों में संघ के विचारों को लोग स्वीकार्य कर रहे है और इसी वजह से वामपंथी बौखला रहे है छटपटा रहे है । जब से देश आजाद हुआ है तब से अब तक वामपंथियों का ही शिक्षण और बौद्धिक संस्थानों पर कब्ज़ा था पर अब संघ की स्वीकार्यता बढ़ने के कारन इनका सिंहासन इन्हें  डोलता हुआ दिख रहा है इसलिए ये आरोप लगा रहे है की संघ अपनी विचारधारा थोप रहा है पर सभी जानते है ऐसा कुछ भी नहीं है । संघ हमेशा से अपनी विचारधरा पर अडिग रहा है और बौद्धिक विकास को समग्रता से विकसित करना  चाहता हैं। हम इनके बौद्धिक आतंकवाद को  इनके हर कुतर्क का मुंहतोड़ जवाब देकर कर सकते है । 


हम इस बौद्धिक आतंकवाद  से लेकर रहेंगे --- आजादी 
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