रविवार, 11 सितंबर 2011

दिल्ली में आज सुबह एक और धमाका . . . . (India behind the lens )

दिल्ली में आज सुबह एक और धमाका
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दिल्ली में आज सुबह एक बार फिर मदर डेरी ने दूध पर २ रूपये बढाये, लाखो लोग इस धमाके में घायल हुए, हालांकि अभी तक किसी आतंकी दल ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है परन्तु घायलों ने कांग्रेसी दल का हाथ बताया है

घायलों ने कांग्रेसी दल का हाथ बताने की वजह बताते हुए कहा की इस धमाके में प्रयोग किया गया पदार्थ "मेहेंगाई" है जो की इस दल का एक मुख्य घातक तत्त्व रहा है लोगो का कहना है कि ये दल पिछले ८ सालो में ऐसे धमाके पहले भी करता रहा है

रविवार, 3 अप्रैल 2011

गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा , आँचल का हो सार तुम्हारा |

निर्मल पावन कोमल शीतल ,
कैसा है स्पर्श तुम्हारा |
तन मन की कैसी पीड़ा हो ,
हर लेता है प्यार तुम्हारा |

जब भी जीवन में थकता हूँ ,
तेज धुप में मैं तपता हूँ |
जीवन का हर ताप मिटाता
आँचल का इक सार तुम्हारा |

मुझे खिला तुम भूखे रहती ,
ढाल बनी सब सुख दुःख सहती |
शब्दों में ना कह पाउँगा ,
अकथनीय है प्यार तुम्हारा |

बचपन में जब बाल खींचकर ,
जब - जब मैंने तुमको मारा |
तब - तब तुमने शीश चूमकर ,
जाने तुमने कितना दुलारा |
कैसे भूल सकूँगा माँ मैं ,
निश्छल वो दुलार तुम्हारा |

मन में अब अभिलाषा एक ,
चाहे मिले जन्म अनेक |
गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा ,
आँचल का हो सार तुम्हारा |

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

एक नया ब्लॉग

मेरे एक मित्र जो गैर सरकारी संगठनो में कार्यरत हैं के कहने पर एक नया ब्लॉग सुरु किया है जिसमें सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति , मानव तस्करी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों को उठाया जायेगा | आप लोगों का सहयोग और सुझाव अपेक्षित है |
आज का विषय वेश्यावृत्ति और मानव तस्करी हैं

रविवार, 7 नवंबर 2010

बचपन की दीपावली, कुछ यादें


कहते है त्यौहार बच्चो के होते हैं , उनके लिए त्योहारों का अर्थ होता है नए कपडे, मिठाईयां इत्यादि | बच्चे त्योहारों का इंतज़ार करते है और बड़े सिर्फ छोटो की ख़ुशी के लिए शामिल होते है और अपना बचपन उनमें पाकर उन्हें खुश देखकर खुश होते है | मैंने कहीं ये शेर पढ़ा था याद नहीं किसने लिखा है ,

बच्चों के छोटे हांथों को चाँद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे

बचपन बीते एक अरसा बीत गया है पर बचपन की यादें अभी भी ताज़ा है जैसे कल की ही बात हो | बीती रात दीपावली बचपन की कई यादो को ताज़ा कर चली गयी | बचपन में दीपावली की आहट से ही मन परफुल्लित हो उठाता था , उस वक़्त कोई रोक - टोक नहीं कोई टेंशन नहीं बस दीपावली के जश्न मनाने का जोश रहता था और शायद यही वजह होती थी की हम बच्चो की दीपावली कम से कम एक हफ्ते पहले से शुरू हो जाती थी | सब लोग मिलकर पटाखे जलाते थे, दीप जलाते थे और कितने प्रेम सौहार्द और जोश के साथ दीपावली का आनंद लेते थे | बहुत मजा आता था | दिवाली के त्योहार के लिये हमारे पूरे घर में सफाई-पुताई का अभियान चलता था। दिवाली पर पूरा घर रोशनियों से जगमगा उठता था। मुझे यह सब कुछ बहुत अच्छा लगता था, इसीलिये मुझे दिवाली का त्योहार बचपन से ही बहुत पसंद है। हम आपने घरो , मंदिरों आदि स्थानों पर दीप जलाते थे ,पटाखे फोड़ते थे ,वैसे मेरे लिए दीपावली का एक अर्थ यह भी था की खूब सारे पटाखे फोड़ना और जमकर शैतानी करना, पर हमें दीपावली के सुबह का इंतज़ार रहता था की कब सुबह हो और हम ढेर सारे दिए लूट ले | हम उन दीयों से तराजू बनाते थे और पुरे दिन कुछ ना कुछ खेलते रहते थे | कभी कभी हम भाई - बहन दीयों को लेकर आपस में लड़ पड़ते थे | क्या दिन थे वो भी , काश वो दिन फिर से लौट आते ...................................

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