शनिवार, 30 अप्रैल 2016

लो दिन बीता लो रात गयी -- हरिवंशराय बच्चन

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था
दिन में होगी कुछ बात नई
लो दिन बीता, लो रात गई

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फ़ैले,
सौ रजनी सी वह रजनी थी,
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई

चिडियाँ चहकी, कलियाँ महकी,
पूरब से फ़िर सूरज निकला,
जैसे होती थी, सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रात: कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

वामपंथी विचारधारा -- एक बौद्धिक आतंकवाद





वामपंथी विचारधारा एक बौद्धिक आतंकवाद है और इनका अस्तित्व तभी तक है जब तक ये व्यवस्था में नीति निर्धारण में है ।  देश में लगातार अपना जनाधार खोने के कारन वामपंथी बौखला गया है जिसका परिणाम असहिष्णुता , अवार्ड वापसी, अफजल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल जिन्दा है के रूप में देखने को मिला । JNU  यूनिवर्सिटी इनका गढ़ है और जब इनके गढ़ में राष्ट्रवादी घुस आये है तो ये बौखलाए बौखलाए बौखलाए घूम रहे है और हर दिन एक नया प्रोपोगंडा रच के विषय से ध्यान हटाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है । हालाँकि ऐसा नहीं है की JNU  में ऐसी घटनाएं पहली बार हुयी हो इससे पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएं हो चुकी है। 
जैसे की कैंपस में भारत - पकिस्तान मुशायरे में भारत विरोधी बातों का विरोध करने पर वामपंथियों द्वारा सैनिकों की पिटाई कर दी जाती है। दंतेवाड़ा में जब सैनिक शहीद होते है तो ये जश्न मानते है । महिसासुर दिवस मानते है और माँ दुर्गा को सेक्स वर्कर तक घोसित कर देते है । यह एक तरह का बौद्धिक आतंकवाद है
। इस प्रकार लगातार ये देश विरोधी और धार्मिक भावनाओ को भड़काने वाली गतिविधियाँ करते रहे थे पर इस बार देश ने इन्हें रंगे हांथो पकड़ लिया । आजतक वामपंथियों ने इसी के कारण आरएसएस को हासिये पर रख रखा था पर अब ऐसा नहीं है लेकिन अब ऐसा नहीं है , अब आमजनों में संघ के विचारों को लोग स्वीकार्य कर रहे है और इसी वजह से वामपंथी बौखला रहे है छटपटा रहे है । जब से देश आजाद हुआ है तब से अब तक वामपंथियों का ही शिक्षण और बौद्धिक संस्थानों पर कब्ज़ा था पर अब संघ की स्वीकार्यता बढ़ने के कारन इनका सिंहासन इन्हें  डोलता हुआ दिख रहा है इसलिए ये आरोप लगा रहे है की संघ अपनी विचारधारा थोप रहा है पर सभी जानते है ऐसा कुछ भी नहीं है । संघ हमेशा से अपनी विचारधरा पर अडिग रहा है और बौद्धिक विकास को समग्रता से विकसित करना  चाहता हैं। हम इनके बौद्धिक आतंकवाद को  इनके हर कुतर्क का मुंहतोड़ जवाब देकर कर सकते है । 


हम इस बौद्धिक आतंकवाद  से लेकर रहेंगे --- आजादी 

क्या परिच्छा दे "कटहल"

जटाशंकर ,अब प्राइमरी स्कूल मे अध्यापक है , बचपन ने बहुत ही शरारती थे पढ़ाइ लिखाइ मे मन नही लगता था । इनकि शरारतो से लोग इतना परेशान थे कि लोगों ने इनका नाम पखंडु रख दिया था। एक किस्सा तो ये खुद ही बताते है।
एक बार उनको कोइ इक्ज़ाम देने जाना था।  इक्जा़म का सेंटर घर से कोइ 10-15 किलोमीटर दूरऔर सुबह के पाली मे यानी 9 बजे से था। पखंडु ने सोचा क्यों न कुछ कमाइ कर ली जाये , परिच्छा तो होती रहती है हो ही जायेगी पर किया क्या जाये, बहुत सोचने बिचारने पर एक आीडीया आया लेकिन उस पर अमल करना खतरनाक था ।पकड़े जाने पर पिटाइ हो सकती थी पर पखंडु पिटाइ से कब डरने वाले थे बस चल दिये अपने मिशन पर । रात को ही गांव मे चोरी से लोगो के कटहल चुराये और सुबह ही सुबह सााइकिल ली बोरे मे कटहल भरा और चल दिये कि सुबह सुबह मंडी मे बेच देंगे पर अभी परेशानी खत्म नही हुयी थी आधे रास्ते ही पहुंचे थे कि साइकिल पंक्चर हो गयी ।अब इतनी सुबह पंक्चर बनाने वाला मुश्किल था पर कुछ पूछ - ताछ करने पर पता चला कि पास मे हि एक आदमी है जो मदद कर सकता है यानी पंक्चर बना सकता है पर उस आदमी ने इनसे पंक्चर ठीक करने के बदले जब पैसे मांगे तो इनको याद आया कि चोरी करने के चक्कर मे और घर से जल्दि निकलने के चक्कर मे पैसे तो घर पर छोड़ आये है , पंकचर बनाने वाले ने भी भॉप लिया कि कुछ गड़बड़ है । उसने बोला पैसे दो नहीं तो ये बोरा यहीं छोड़ जाओ। बेचारे पखंडु के पास कोइ चारा न था बोरी वही छोड़ दी और वापस घर कि तरफ चल दिये क्योकि अब इक्जाम देने का कोइ मतलब नहीं रहा । गांव पर सब लोग परेशान थे कि रात को पता नहीं कौन कटहल चुरा ले गया इनको आते देख किसी ने इनसे पूछ लिया कि इक्जाम देने नहीं गये क्या , इनके मुह से निकला - अब का परिच्छा देने जाये "कटहल" । लोगो को समझते देर नही लगी क् कटहल इन्होने ही चुराया है बस लोगो ने जम कर कूट दिया । तब से आज तक कसम खाते है और सपने भी चोरी से बचते है और साथ मे ये भी कहते हैं कि चोरी का धन मोरी मे जाता है का इससे अच्छा उदाहरण नही हो सकता , बाकी जो है सो हइयै है । 

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

वामपंथ और नारी सशक्तिकरण



वामपंथ भारत और भारतीय मूल्यों के लिए सबसे बड़ा खतरा है|ये झूठ की बुनियाद पर विचारों का वितंडावाद खड़ा करते हैं|इन्होंने चतुराई से तमाम शैक्षिक-साहित्यिक-संस्थानिक इकाइयों पर कब्ज़ा जमा लिया और वेद-उपनिषद-इतिहास-दर्शन आदि की भी मनमानी व्याख्याएँ करने लगे|अनर्गल प्रलाप का विश्वव्यापी ठेका ले रखा है इन्होंने!ये हर चीज की व्याख्या वर्ग-संघर्ष की अपनी संकीर्ण अवधारणा के आधार पर करते हैं और भारत में तो इनकी वर्गीय चेतना भी जातियों में विभक्त है| ये कह रहे हैं कि सिंदूर, पायल,मंगलसूत्र,बिंदी आदि गुलामी के प्रतीक हैं और आर्य स्त्रियाँ इन्हें इसलिए पहनती रहीं कि लंबे समय तक इन्हें साँकल में बाँधकर उसी तरह रखा गया जिस तरह पशुओं को रखा जाता है|ज़रा सोचिए कितना लचर तर्क है,तो क्या कल को ये यह भी कहेंगे कि वस्त्र आदि धारण करना भी गुलामी का प्रतीक है और इसे भी उतारकर फेंक देना चाहिए|इन जाहिलों को कौन समझाए कि मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा में सौंदर्य व मूल्य-बोध स्वाभाविक रूप से विकसित होते गए|स्त्रियों का सजना-संवरना उनकी स्वाभाविक रूचि और स्वाधिकारों से जुड़ा मसला है न कि थोपा गया व्यवहार|देश के बहुत से हिस्सों में पुरुष भी कर्णछेदन कराते हैं,वे भी अंगूठी,माला कड़ा आदि पहनते हैं तो क्या उन्हें अनार्य स्त्रियों ने गुलाम बनाया था?जब आभूषण चलन में नहीं आए थे तब भी वनफूलों से जूड़े आदि बनाने का चलन था|सभ्यता के विकास के साथ-साथ चाहे स्त्री हो या पुरुष उनमें स्वयं को सुंदर तरीके से प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति पनपी और इसमें कुछ भी अस्वाभविक नहीं है| आर्य-अनार्य का सिद्धांत ही इन्होंने इसलिए गढ़ा है ताकि आसानी से लोगों को लड़ाया जा सके और राष्ट्रीय सोच को कुंद किया जा सके|क्या यह पुरुषवादी मानसिकता नहीं है कि स्त्रियों से यह कहा जाय कि तुम स्वयं को बेहतर तरीके से प्रस्तुत मत करो,कि तुम सजो-संवरो नहीं,कि तुम दीन-हीन-लाचार अवस्था में जीती रहो! इतना ही नहीं ये यौनिक स्वतंत्रता की बात करते हैं,इस स्वतंत्रता में भी गुलामी की वृत्ति छुपी है|एक पुरुष का परित्याग कर किसी अन्य के वरन् में आज़ादी कहाँ हुई?स्त्रियों की आज़ादी के नाम पर ये वामपंथी किसी भी प्रकार के बेसिर-पैर की बात करते हैं और सोचते हैं कि वे जो सोच रहे हैं वह बहुत क्रांतिकारी,बहुत ही क्रांतिकारी है|इन सारी बहसों में एक बार स्त्रियों की राय लेकर भी तो देख लीजिए कॉमरेड,आपको दूध का दूध और पानी का पानी नज़र आ जाएगा!

तुम तुंग - हिमालय - शृंग और मैं चंचल-गति सुर-सरिता। --- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

 

 

तुम तुंग - हिमालय - शृंग
और मैं चंचल-गति सुर-सरिता।
तुम विमल हृदय उच्छवास
और मैं कांत-कामिनी-कविता।

तुम प्रेम और मैं शांति,
तुम सुरा - पान - घन अंधकार,
मैं हूँ मतवाली भ्रांति।
तुम दिनकर के खर किरण-जाल,
मैं सरसिज की मुस्कान,
तुम वर्षों के बीते वियोग,
मैं हूँ पिछली पहचान।

तुम योग और मैं सिद्धि,
तुम हो रागानुग के निश्छल तप,
मैं शुचिता सरल समृद्धि।
तुम मृदु मानस के भाव
और मैं मनोरंजिनी भाषा,
तुम नन्दन - वन - घन विटप
और मैं सुख -शीतल-तल शाखा।

तुम प्राण और मैं काया,
तुम शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म
मैं मनोमोहिनी माया।
तुम प्रेममयी के कंठहार,
मैं वेणी काल-नागिनी,
तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार,
मैं व्याकुल विरह - रागिनी।

तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु,
तुम हो राधा के मनमोहन,
मैं उन अधरों की वेणु।
तुम पथिक दूर के श्रांत
और मैं बाट - जोहती आशा,
तुम भवसागर दुस्तर
पार जाने की मैं अभिलाषा।

तुम नभ हो, मैं नीलिमा,
तुम शरत - काल के बाल-इन्दु
मैं हूँ निशीथ - मधुरिमा।
तुम गंध-कुसुम-कोमल पराग,
मैं मृदुगति मलय-समीर,
तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष,
मैं प्रकृति, प्रेम - जंजीर।

तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति,
तुम रघुकुल - गौरव रामचन्द्र,
मैं सीता अचला भक्ति।
तुम आशा के मधुमास,
और मैं पिक-कल-कूजन तान,
तुम मदन - पंच - शर - हस्त
और मैं हूँ मुग्धा अनजान!

तुम अम्बर, मैं दिग्वसना,
तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम,
मैं तड़ित् तूलिका रचना।
तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि,
तुम नाद - वेद ओंकार - सार,
मैं कवि - श्रृंगार शिरोमणि।

तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति,
तुम कुन्द - इन्दु - अरविन्द-शुभ्र
तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति।

आरक्षण और मनुवाद



जब आरक्षण का लाभ ले रहे धनी लोगों से आरक्षण छोड़ने की बात की जाती है तो वो एक ही बात कहते हैं आप मनुवाद छोड़ दो हम आरक्षण छोड़ देंगे। आज कितने घरों में मनुस्मृति देखने को मिलती है? शायद लाखों में एक घर ऐसा होगा जहां मनुस्मृति देखने को मिले। इसका कारण ये है की हिंदुओं ने स्वयं इसे अव्यवहारिक समझकर इसका परित्याग कर दिया है और बाजार में जो उपलब्ध भी है वह विकृत रूप में हैं यानि हिन्दू विरोधियों ने उसमें छेड़छाड़ कर सवर्णों को बुरा बताने का हर सम्भव प्रयास किया है। फिर भी मनुवाद का ठप्पा फेविकोल की तरह सवर्ण हिंदुओं के साथ चिपका दिया गया है..........

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