रविवार, 9 मई 2010

कुछ बीती बिस्म्रित बातें

मानस सागर के तट पर ,
ये तेज लहर की घातें |
कल कल ध्वनि से हैं कहती,
कुछ बीती बिस्म्रित बातें |

मधुमय मादक मुस्कान लिए ,
जब पहले देखा तुमको |
जन्मो का है साथ तुम्हारा,
ये लगा उसी क्षण मुझको |

मैं अपलक इन नयनो से ,
देखा करता उस छवि को |
जैसे सूर्यमुखी का पौधा,
देखा करता है रवि को |
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कौंध दामिनी सी स्मृतिया , उर में आग लगा जाती हैं

कौंध दामिनी सी स्मृतिया , उर में आग लगा जाती हैं .
सम्मोहन स्वर मन में उभरे , बिरह मेघ जगा जाती हैं.
बिरह मेघ की बूंदों से नयन जलज हो जाते हैं.
सुन्या स्रादिस्य सूखे हृद्यांगन भावों से भर जाते हैं.
भाव भरे जब अंतर्मन में , मन पुलकित हो आह्लाद करे.
शुन्य मिलन हो आज प्रिये , ना अधरों पर अवसाद रहे.
भावभरी उस प्रेम सुधा का , हर पल हर छन पान करे.
कर आलिंगनबद्ध प्रतिग्या , आत्ममिलन का ग्यान करें.
हृदय तुम्हें देती हूँ प्रियतम , बंध कर हृदय मुक्त होते हैं.
देह नहीं है परिधि प्रणय की , दीव्य प्रणय उन्मुक्त होते हैं.
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