मंगलवार, 22 नवंबर 2011

एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ

जड़ जग के उपहार सभी हैं,
धार आँसुओं की बिन वाणी,
शब्द नहीं कह पाते तुमसे
मेरे मन की मर्म कहानी,


उर की आग, राग ही केवल
कंठस्थल में लेकर चलता,

एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ

जान-समझ मैं तुमको लूँगा--
यह मेरा अभिमान कभी था,
अब अनुभव यह बतलाता है--
मैं कितना नादान कभी था;


योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
विवश उसे तुम दुहराओगे?

बहुत यही है अगर तुम्हारे अधरों से परिचित हो जाऊँ।
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
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रविवार, 23 अक्तूबर 2011

इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले


इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले
गोविन्द नाम लेके, तब प्राण तन से निकले,

श्री गंगाजी का तट हो, जमुना का वंशीवट हो,
मेरा सावला निकट हो, जब प्राण तन से निकले

पीताम्बरी कसी हो, छबी मान में यह बसी हो,
होठो पे कुछ हसी हो, जब प्राण तन से निकले

जब कंठ प्राण आये, कोई रोग ना सताये
यम् दरश ना दिखाए, जब प्राण तन से निकले

उस वक्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना,
राधे को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले,

एक भक्त की है अर्जी, खुद गरज की है गरजी

आगे तुम्हारी मर्जी जब प्राण तन से निकले


इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले 
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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

हर शाम को जब मैं तनहा रहता हूँ ,क्या जानिये खुद से मैं क्या कहता रहता हूँ

हर शाम को जब मैं तनहा रहता हूँ ,क्या जानिये खुद से मैं क्या कहता रहता हूँ .................

शायद मैं अकेले में तेरे अक्स से मिलता हूँ,
मिलकर तेरे अक्स से मैं फिर बातिएँ करता हूँ,
बातों में यादों के मैं मोती चुनता हूँ ,
यादों के मोती से मैं फिर माला बुनता हूँ
माले से फिर तेरा मैं श्रृंगार करता हूँ
शायद मैं अकेले में तेरे अक्स से मिलता हूँ .............

तुमको ये खबर है की मुझे नींद नहीं आती ,
गर साथ ना हो तुम तो , युहीं रात गुजर जाती ,
इसलिए अक्स बनकर तुम पास चली आती हो ,
लेकर आगोश में अपने कहीं दूर चली जाती हो ,
मैं पाकर साथ तुम्हारा चैन से सोता हूँ ,
शायद मैं अकेले में तेरे अक्स से मिलता हूँ .........
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बुधवार, 28 सितंबर 2011

स्नेह निर्झर बह गया है !! सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"


स्नेह निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है

आम की यह डाल जो सूखी दिखी
कह रही है- "अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-"
जीवन दह गया है।



दिए हैं मैंने जगत को फूल फल
किया है अपनी प्रभा से चकित चल
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल
ठाठ जीवन का वही
जो ढह गया है।



अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा
श्याम तृण पर बैठने को निरूपमा
बह रही है हृदय पर केवल अमा
मैं अलक्षित हूँ यही
कवि कह गया है।

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प्रेम से बोलो जय माता दी ..........


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शनिवार, 24 सितंबर 2011

वह तोड़ती पत्थर ! सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"


वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"
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तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या! महादेवी वर्मा

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल खेल थक थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?
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बुधवार, 21 सितंबर 2011

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने। हरिवंश राय बच्चन जी


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे


अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।

एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है 
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर, 
जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने 
के लिए था कर दिया तैयार तुमने! 
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,
खूबियों के साथ परदे को उठाता, 
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,
और मैंने था उतारा एक चेहरा,
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर 
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने। 
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका
उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम, 
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,
        क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो 
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने। 
रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।

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मंगलवार, 20 सितंबर 2011

था तुम्हें मैंने रुलाया! हरिवंश राय बच्चन जी


हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
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शनिवार, 17 सितंबर 2011

भागवत गीता - २

भागवत गीता 1
भगवत गीता - २ अभी तक आपने सेना का विस्तार और योद्धाओं का वर्णन पढ़ा  अब आगे पढ़े ...............
युद्ध प्रारंभ होने से पहले सब लोगो ने शंख ध्वनि की | जो ह्रदय के सर्वश्व  ज्ञाता है उन कृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाया | विकराल रूप से बहकती हुई इन्द्रियों को समेट कर उन्हें अपने सेवक के श्रेणी में खड़ा कर देना ह्रदय से प्रेरित सद्गुरु की दें है | श्री कृष्ण एक योगेश्वर सद्गुरु थे | 

दैवी संपत्ति को अधीन करने वाला अनुराग ही अर्जुन है | इष्ट के अनुरूप लगाव जिसमे विरह, वैराग्य, अश्रुपात हो , " गदगद गिरा नयन बह नीरा " रोमांच हो | इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषय वास्तु का लेश मात्र टकराव न होने पाए उसी को अनुराग कहते हैं | यदि ये सफल होता है तो परम देव परमात्मा में प्रवेश दिलाने वाली दैवी संपत्ति पर आधिपत्य कर लेता है इसी का दूसरा नाम धनञ्जय भी है , एक धन तो बाहरी संपत्ति है जिससे शारीर निर्वाह की व्यवस्था होती है आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, इससे परे स्थिर आत्मिक संपत्ति ही  निज संपत्ति है | ब्रिह्दारंन्य उपनिषद में य्ग्यवाल्क्य ने मैत्त्रेय को यही समझाया की धन से संपन्न पृथ्वी के स्वामित्व को भी अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती , उसका उपाय आत्मिक संपत्ति है | 

भयानक कर्म वाले भीमसेन से पौण्ड्र अर्थात प्रीत नामक महा शंख बजाया | भाव का उद्गम और निवास स्थान ह्रदय है |  आपका भाव लगाव बच्चे में होता है किन्तु वस्तुतः वो लगाव आपके ह्रदय में है जो बच्चे में जाकर मूर्त होता है | ये भाव अथाह और महान बलशाली है उसने प्रीति नामक महा शंख बजाया | भाव में ही वो प्रीति निहित है इसलिए भीम ने पौण्ड्र - प्रीति नामक शंख बजाया | भाव महान बलवान है किन्तु प्रीति के माध्यम से - " हरि व्यापक सर्वत्र समाना , प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना "|

कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंत विजय नामक शंख बजाया | यद्धे स्थिरः सह युधिष्ठिरः -  प्रकृति पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में स्थिर रहता है महान दुःख से भी विचलित नहीं होता है तो एक दिन जो अनंत है जिसका अंत नहीं है वो है परमतत्व पर्ममता,उसपर विजय दिला देता है |नियम रूपी नकुल ने शुघोश नमक शंख बजाया , ज्यों - ज्यों नियम उन्नत होगा अशुभ का शमन होता जायेगा , शुभ घोषित होता जायेगा | सत्संग रूपी सहदेव ने  मणिपुष्पक शंख बजाया |  मनीषियों ने प्रत्येक श्वाश को मणि की संज्ञा दी है , " हीरा जैसी श्वासा बातो में बीती जाए " |

शिखा सूत्र का त्याग ही शिखंडी है | शिखा लक्ष्य का प्रतीक है जिसे आपको पाना है और सूत्र है संस्कारों का | जब तक आगे परमात्मा का पाना शेष है , पीछे संस्कारों का सूत्रपात लगा हुआ है , तब तक त्याग कैसा ,संन्यास कैसा ,अभी तो चलने वाले पथिक है | जब प्राप्तव्य प्राप्त हो जाए , पीछे लगे हुए संस्कारों की डोर कट जाए , ऐसी अवस्था में सर्वथा भ्रम शांत हो जाता है  इसलिए शिखंडी ही भ्रम रूपी भीष्म का विनाश करता है |  

संयम रूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया  की हे राजन ! उसके उपरान्त वैराग्य रूपी हनुमान , वैराग्य ही ध्वज है जिसका और ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना  जाता है , कुछ लोग कहते है ध्वजा चंचल थी इसलिए कपि - ध्वज कहा गया किन्तु यहाँ कपि साधारण बन्दर नहीं , स्वयं हुनमान थे , जिन्होंने मान अपमान का हनन किया था | प्रकृति की देखि सुनी वस्तुओं से , विषयों से राग का त्याग ही वैराग्य है अतः वैराग्य ही जिसकी ध्वजा है उस अर्जुन ने व्यवस्थित रूप से ध्रितराष्ट्र पुत्रों को देखकर शास्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर श्री कृष्ण से ये बचन कहा की मेरे रथ को दोनों सेनाओ के बीच में खड़ा करे | यहाँ सारथी को दिया गया आदेश नहीं बल्कि इष्ट से की गयी प्रार्थना है | जब तक मैं युद्ध की कमाना वालों को अच्छी प्रकार देख न लूँ की इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है | दुर्बुद्धि दुर्योधन का कल्याण चाहने वाले जो  - जो ये राजा युद्ध में आये हैं उन युद्ध करने वालों को मैं देखूंगा इसलिए रथ को दोनों सेनाओ के बीच में खड़ा करें |

संजय उवाच !
      अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ह्रदय के ज्ञाता श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओ के बीच में उत्तम रथ को खड़ा करके कहा की  " हे पार्थ , इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख "|  इसके उपरान्त अर्जुन ने उन दोनों सेनाओं में स्थित पिता के भाइयों को , पितामहों को , आचार्यों को , मामाओं को , भाइयों को , पुत्रों को , पौत्रों को , मित्रों को और सुह्रिदयों को देखा | दोनों सेनाओं में अर्जुन को केवल अपने परिवार के लोग ही दिखाई पड़े | प्रचिलित गणना के अनुसार अठारह अक्छोहिणी जो की ढाई - पौने तीन अरब के लगभग होता है  , इतना बड़ा जनसमूह अर्जुन का परिवार मात्र था | क्या इतना बड़ा भी किसी का परिवार होता है ? कदापि नहीं ! ये ह्रदय देश का चित्रण है |

 इस प्रकार खड़े हुए उन संपन्न बंधुओं को देखर अर्जुन अत्यंत करुणा से आवृत्त होकर बोला - 
 हे कृष्ण ! इस युद्ध की इच्छा वाले खड़े हुए स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं , मुख सुखा जाता है और मेरे शारीर में रोमांच हो रहा है , इतना ही नहीं - हाँथ से गांडीव गिरता है , त्वचा भी जल रही है " | अर्जुन संतप्त हो उठा की ये कैसा युद्ध है जिसमें स्वजन ही खड़े हैं अर्जुन को भ्रम हो गया  वो कहता है " अब मैं खड़ा रहने में भी अपने को असमर्थ पा रहा हूँ , अब आगे देखने की सामर्थ्य नहीं है | हे केशव इस युद्ध का लक्षण भी बिपरीत ही देखता हूँ युद्ध में अपनों को मारकर परम कल्याण भी नहीं देखता हूँ , कुल को मारने से कल्याण कैसे होगा ? हे श्री कृष्ण मैं विजय नहीं चाहता , राज्य तथा सुख भी नहीं चाहता हमें इनसे क्या प्रयोजन है ? हमें जिनके लिए राज्य , भोग  सुखादि इच्छित है वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं , हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकर , किन्तु जब सब के सब प्राणों की आशा त्यागकर युद्ध के लिए खड़े है तो मुझे राज्य अथवा भोग नहीं चाहिए , ये सब इन्हीं के लिए था इनसे अलग होने पर हमें इनकी आवश्यकता नहीं है | हे मधुसुदन मैं तीन लोक के 
राज्यों के लिए भी मैं इन सबको मरना नहीं चाहता फिर पृथ्वी के लिए कहना ही क्या ! |

अठारह अक्छोहिणी सेना में अर्जुन को अपने स्वजन ही दिखाई देते है , इतने अधिक स्वजन वास्तव में क्या हैं ? वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है | भजन के आरम्भ में प्रत्येक अनुरागी के समक्ष येही समस्या रही है , सभी चाहते हैं की हम भजन करे , उस परम सत्य को पा ले , किन्तु किसी अनुभवी सद्गुरु के संरक्षण में कोई अनुरागी जब क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ के संघर्ष को समझता है की हमें किनसे लड़ना है तो वो हताश हो जाता है, वो चाहता है की सब लोग साथ रहे सभी सुखी रहे और इन सबकी व्यवस्था करते हुए भी हम परमात्मा स्वरूप की प्राप्ति भी कर ले | किन्तु जब वो समझता है की आराधना में अग्रसर होने के लिए परिवार छोड़ना होगा , इन संबंधो का मोह समाप्त करना होगा तो वो अधीर हो उठता है | केवल अर्जुन ही अधीर था ऐसी बात नहीं है | अनुराग सबके ह्रदय में होता है, प्रत्येक अनुरागी अधीर होता है उसे सम्बन्धी याद आने लगते हैं | पहले वो सोचता था की भजन से कुछ लाभ होगा तो ये सब सुखी होंगे , इनके साथ रहकर ये सब भोगेंगे | जब ये साथ ही नहीं रहेंगे तो सुख लेकर क्या करेंगे | अर्जुन की दृष्टि राज्य सुख तक ही सीमित थी , वो त्रिलोकी के साम्राज्य को ही सुख की पराकाष्ठा समझता था | इसके आगे भी कोई सत्य है इसकी जानकारी अर्जुन को अभी नहीं है |

वो कहता है  -" हे जनार्दन !  ध्रितराष्ट्र के पुत्रों को भी मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी , जहां ध्रितराष्ट्र अर्थात धृष्टता का राष्ट्र है उससे उत्पन्न मोह रूपी दुर्योधन को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ? इन आततायिओं को मारकर हमें पाप ही तो लगेगा"

 जो जीवन यापन के तुच्छ लाभ के लिए अनीति अपनाता है वो आततायी कहलाता है किन्तु इससे भी बड़ा आततायी वो है जो आत्मा के पथ में अवरोध उत्पन्न करता है | आत्मदर्शन में बाधक काम , क्रोध , मोह , लोभ आदि का समूह ही आततायी है | 

अर्जुन कहता है - हे जनार्दन ! कुल नाश से होने वाले दोषों को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यूँ नहीं विचार करना चाहिए ?  मैं ही पाप करता हूँ ऐसी बात नहीं , आप भी भूल करने जा रहे है !
कृष्ण पर भी आरोप लगाया ! अभी वो समझ में अपने को कृष्ण से कम नहीं मानता | प्रत्येक नया साधक  , सद्गुरु के शरण जाने पर इसी प्रकार तर्क करता है और अपने को जानकारी में कम नहीं समझता | येही अर्जुन भी कहता है की ये भले न समझे किन्तु हम आप तो समझदार हैं कुल नाश के दोषों पर हमें विचार करना चाहिए |

 कुलनाश में दोष क्या है ? - कुल के नाश होने से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं धर्म के नष्ट होने पर संपूर्ण कुल को पाप भी बहुत दबा लेता है | हे कृष्ण पाप के अधिक बच जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्ण-संकर उत्पन्न होता है | अर्जुन की मान्यता थी की कुल की स्त्रियों के दूषित होने से वर्ण - संकर होता है किन्तु श्री कृष्ण ने इसका खंडन करते हुए आगे बताया की मैं अथवा स्वरुप में स्थित महापुरुष यदि आराधना क्रम में भ्रम उत्पन्न कर दे तब वर्ण - संकर होता है | वर्ण संकर के दोषों पर अर्जुन प्रकाश डालता है - वर्ण - संकर कुलघाती और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है , लुप्त हुई पिंड क्रिया वाले इनके पितर लोक भी गिर जाते है , वर्तमान नष्ट हो जाता है ,अतीत के पितर गिर जाते है और भविष्य वाले भी गिरेंगे | इतना ही नहीं - इन वर्ण - संकर करक दोषों से कुल और कुलघातियों का सनातन कुल धर्म और जाती धर्मं नष्ट हो जाते हैं | अर्जुन मानता था की कुल धर्म सनातन है , कुल धर्म ही शास्वत है किन्तु श्री कृष्ण ने इसका खंडन किया और आगे बताया की आत्मा ही सनातन धर्म है | वास्तविक सनातन धर्म को जानने से पहले  मनुष्य धर्म के नाम पर किसी न किसी रुढी को जानता है |    
                                              जारी .................................................
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हरिवंश राय बच्चन जी की " मधुबाला "



मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझपर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आकर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


मधुघट ले जब करती नर्तन,
मेरे नूपुर के छम-छनन
में लय होता जग का क्रंदन,
झूमा करता मानव जीवन
का क्षण-क्षण बनकर मतवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


मैं इस आँगन की आकर्षण,
मधु से सिंचित मेरी चितवन,
मेरी वाणी में मधु के कण,
मदमत्त बनाया मैं करती,
यश लूटा करती मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


था एक समय, थी मधुशाला,
था मिट्टी का घट, था प्याला,
थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,
था बैठा ठाला विक्रेता
दे बंद कपाटों पर ताला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

तब इस घर में था तम छाया,
था भय छाया, था भ्रम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
ऊषा का दीप लिए सर पर,
मैं आई करती उजियाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


सोने की मधुशाना चमकी,
माणित द्युति से मदिरा दमकी,
मधुगंध दिशाओं में चमकी,
चल पड़ा लिए कर में प्याला
प्रत्येक सुरा पीनेवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,
थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,
थे जड़वत् प्याले भूमि पड़े,
जादू के हाथों से छूकर
मैंने इनमें जीवन डाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


मुझको छूकर मधुघट छलके,
प्याले मधु पीने को ललके ,
मालिक जागा मलकर पलकें,
अँगड़ाई लेकर उठ बैठी
चिर सुप्त विमूर्च्छित मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


प्यासे आए, मैंने आँका,
वातायन से मैंने झाँका,
पीनेवालों का दल बाँका,
उत्कंठित स्वर से बोल उठा,
‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’
मैं मधुशाला की मधुबाला!


खुल द्वार गए मदिरालय के,
नारे लगते मेरी जय के,
मिट चिह्न गए चिंता भय के,
हर ओर मचा है शोर यही,
‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,
मैं मधुशाला की मधुबाला!

हर एक तृप्ति का दास यहाँ,
पर एक बात है खास यहाँ,
पीने से बढ़ती प्यास यहाँ,
सौभाग्य मगर मेरा देखो,
देने से बढ़ती है हाला!
मैं मधुशाला की मधुबाला!


चाहे जितना मैं दूँ हाला,
चाहे जितना तू पी प्याला,
चाहे जितना बन मतवाला,
सुन, भेद बताती हूँ अन्तिम,
यह शांत नही होगी ज्वाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


मधु कौन यहाँ पीने आता,
है किसका प्यालों से नाता,
जग देख मुझे है मदमाता,
जिसके चिर तंद्रिल नयनों पर
तनती मैं स्वप्नों का जाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,
यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,
स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,
स्वप्नों की दुनिया में भूला
फिरता मानव भोलाभाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

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रविवार, 11 सितंबर 2011

भागवत गीता 1


तरह तरह की पूजा पद्धतिया , परस्पर विरोधी संगठन, धर्म के नाम पर प्रचलित हैं , जबकि धर्म का लक्ष्य है , एक परमात्मा की शोध | कल्याण स्वरूप वो परमात्मा एक है , उसे प्राप्त करने की निश्चित क्रिया का पालन धर्म है|

जब परमात्मा एक है , उसे प्राप्त करने की क्रिया एक है तो बहुत से पंथ क्यूँ ?

धर्म के सरल स्वरूप और उसके प्राप्ति हेतु निर्धारित क्रिया का क्रमबद्ध तथा पूर्णा विवरण भागवत गीता है| विश्व के प्रत्येक महापुरुष ने जो कुछ भी साधन बताया है वो सब का सब तथा अनेक गोपनीय स्तितियों का स्पष्टीकरण अकेले गीता में है, इसलिए संपूर्ण मानव जाती के कल्याण का शास्त्र गीता है| महाभारत में संकेत है की जब कौरव और पांडव की सेनायें आमने सामने खड़ी हो गयी तो संपूर्ण निशांतर कौरव में प्रवेश कर गये और सभी देवता पांडव में, इस कथन से महर्षि व्यास ने स्पष्ट कर दिया की गीता के सभी पात्र देवता या असुर हैं तथा प्रतीकात्मक हैं | प्रत्येक मनुष्य के अंतः करण मे दैवी और आसुरी दो प्राकृतीया अनादि काल से है, दैवी शक्तियों के सहयोग से जब मनुष्य अपने आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होता है तो काम , क्रोध , राग , द्वेष इत्यादि आसुरी वृत्तियाँ बाधा के रूप में आक्रमण करती है , उनका पार पाना ही वास्तविक युद्ध है| 

 अर्जुन श्रेय के लिए विकल था, उसकी दृष्टि में श्रेय का उपाय था कुलधर्म, पिन्दोदक क्रिया , वर्ण संकर से बचाव , कुल क्षय से बचाने के लिए युद्ध ना करना इत्यादि | मात्र इतनी सी शंका के समाधान हेतु भगवान को उसे १८ अद्धयाय गीता समझानी  पड़ी, अंत में पूछा की क्या तेरा मोह नष्ट हुआ , अर्जुन ने स्वीकार किया की भगवन् मेरा मोह नष्ट हो गया और अब मैं वैसा ही करूँगा जैसा भगवान ने उपदेश दिया है | वस्तुतः ये केवल अर्जुन की शंका नही थी बल्कि मानव मात्र की शंका है की श्रेय क्या है उसे कैसे प्राप्त करे इसलिए मानव मात्र के लिए गीता के १८ अद्ध्यायों का नियमित पाठ नितांत आवश्यक है| इस गीता ज्ञान के बिना कोई भी मनुष्य उस ईश्वर के पथ पर नही चल सकता|

अज्ञान रूपी धृतराष्ट्र और संयम रूपी संजय| अज्ञान मन के अंतराल मे रहता है, अज्ञान से आवृत "मन" धृतराष्ट्र जन्मांध है किंतु "संयम" रूपी संजय के माध्यम से ये देखता है सुनता है , वो समझता है की परमात्मा ही सत्य है, फिर भी जब तक इससे उत्पन्न "मोह" रूपी दुर्योधन जीवित है इसकी दृष्टि सदैव कौरवो पर रहती है, विकारो पर ही रहती है|

धर्म एक क्षेत्र है , जब हृदय देश में दैवी संपत्ति का बाहुल्य होता है तो ये शरीर धर्म क्षेत्र बन जाता है और जब इसमे आसुरी संपत्ति का बाहुल्य होता है तो ये शरीर कुरुक्षेत्र बन जाता है| 

कुरू अर्थात करो, ये शब्द आदेशात्मक है | 

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं की प्रकृति से उत्पन्न तीनो गुनो द्वारा परवश् होकर मनुष्य कर्म करता है, वो क्षण मात्र भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता | जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं कुरू लगा रहेगा अतः जन्म मृत्यु वाला क्षेत्र, विकारो वाला क्षेत्र, कुरुक्षेत्र है और परंधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलाने वाली पुण्यमयी प्रवित्तियों का क्षेत्र धर्मक्षेत्र है| पुरातातविद्ड़ पंजाब में, काशी-प्रयाग के मद्ध्य तथा अनेकानेक स्थलो पर कुरुक्षेत्र के शोध मे लगे है किंतु गीतIकार ने स्वयं बताया है की जिस क्षेत्र मे ये युद्ध हुआ वो कहा है " इदं शरिरम कौन्तेय क्षेत्र मिटया विथियते " अर्जुन ये शरीर ही क्षेत्र है और जो इसको जनता है इसका पार पा लेता है वो क्षेत्रग्या है|

आगे इन्होने क्षेत्र का विस्तार बताया  जिसमे दस इंद्रिया , मन , बुद्धि , अहंकार , पाँचो विकार और तीनो गुणों का वर्णन है | शरीर ही क्षेत्र है, एक अखाड़ा है, इसमे लड़ने वाली प्रवित्तिया दो है, दैवी संपन्न और आसुरी संपन्न | पांडु की संतान और धृतराष्ट्र की संतान सजातीय और विजातीय प्रवित्तिया | अनुभवी महापुरुषो के शरण जाने पर इन दोनो प्रवित्तियों में संघर्ष का सूत्रपात्र होता है, ये क्षेत्र, क्षेत्रग्या का संघर्ष है और यही वास्तविक युद्ध है | विश्वयुद्धो से इतिहास भरा पड़ा है किंतु उनमे जीतने वालो को भी शास्वत विजय नही मिलती, ये तो आपसी बदले है ! प्रकृति  से परे की सत्ता का दिगदर्शन करना और उसमे प्रवेश पाना ही वास्तविक विजय है| यही एक ऐसी विजय है जिसके पीछे हार नही है , यही मुक्ति है जिसके पीछे जन्म मृत्यु का बंधन नही है | इस प्रकार अज्ञान से आच्छादित प्रत्येक मान संयम के द्वारा जIनता है की क्षेत्र-क्षेत्रग्या के युद्ध मे क्या हुआ | अब जैसा जिसके संयम का उत्थान है वैसे वैसे उसे दृष्टि आती जाएगी |

  उस समय राजा दुर्योधन ने पांडवों की सेना को देखकर द्रोणाचर्या के पास जाकर ये वचन कहा| द्वैत के आचरण ही द्रोणाचर्या है | जब जानकारी हो जाती है की हम परमात्मा से अलग हो गये है वहाँ उसकी प्राप्ति के लिए तदब पैदा हो जाती है , तभी हम गुरु की तलाश मे निकलते है | दोनो प्रवित्तियो के बीच यही प्राथमिक गुरु है यद्यपि बाद के गुरु योगेश्वर श्री कृष्ण होगे जो योग की स्थिति वाले होंगे| राजा दुर्योधन आचार्य के पास जाता है , मोह रूपी दुर्योधन , मोह जो सभी व्याधियों का मूल है राजा है| दुर्योधन , दुरू अर्थात दूषित , योधन अर्थात वह धन | संपत्ति मोह रूपी दोष को उत्पन्न करती है ये प्रकृति की ओर खीचता है और वास्तविक जानकारी के लिए प्रेरणा भी प्रदान करता है| मोह है तभी तक पूछने का प्रश्न भी है  अतः पुण्य से प्रवाहित सजातीय प्रवित्तियों को संगठित देखकर अर्थात पांडवों की सेना देखकर मोह रूपी दुर्योधन ने गुरु द्रोण के पास जाकर ये कहा " हे आचार्या ! आपके बुद्धिमान शिष्य ध्रुपद पुत्र ध्रिस्तद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गयी पांडु पुत्रो की भारी सेना को देखिए" शाश्वत अचल पद मे आस्था रखने वाला दृढ़ मान ही ध्रिस्तद्युम्न है , यही पुण्यमयी प्रवित्तियों का नायक है | साधन कठिन नही मन की दृढ़ता कठिन होनी चाहिए |

 अब देखे सेना का विस्तार !

      इस सेना में महेशवाशा ' महान इश् में वाश दिलाने वाले ' , भाव रूपी भीम , अनुराग रूपी अर्जुन के समान बहुत से शूरवीर जैसे -  सात्विकता रूपी सात्याकी ,  विराट ' सर्वत्र ईश्वरिया प्रवाह की धारणा ' महारथी राजा ध्रुपद अर्थात अचल स्थिति तथा धृशटयाकेतु - दृढ़ कर्तव्या, कॅशिराजा - काया रूपी काशी मे वो साम्राज्या है,   पुरुजित - स्थूल, सूक्ष्म शरीरो पर विजय दिलाने वाला , कुन्तीभोजाः - अर्थात सत्य व्यवहार और पराक्रमी युधामान - युद्ध के अनुरूप मन की धारणा , उत्तमौजा - शुभ की मस्ती , शुभद्रा पुत्र अभिमन्यु - जब शुभ आधार आ जाता है तो मन भय से रहित हो जाता है ऐसा शुभ आधार से उत्पन्न अभय मॅन , ध्यान रूपी द्रौपदी के पाँचो पुत्र - वत्सल्या, लावण्या, सौम्यता, स्थिरता , सहृदयता | सब के सब महारथी है |

इस प्रकार दुर्योधन ने पांडव पक्ष के पंद्रह- बीस नाम गिनाए | विजIतिया प्रवित्ती का राजा होते हुए भी मोह ही सजातीय प्रवित्तियों को समझने के लिए बIद्धया करता है |

दुर्योधन अपना पक्ष संक्षेप में कहता है - यदि कोई वाह्य युद्ध होता तो अपनी फौज बढ़ा चढ़ा कर गिनाता, विकार कम गिनाए गये,  क्योंकि उनपर विजय पाना है, वे नाशवान है| केवल पाँच - सात विकार बताए गये जिनके अंतराल में संपूर्णा बहिरमुखी प्रवित्ती विद्यमान है जैसे -  द्वैत का आचरण करने वाले द्रोण, भ्रम रूपी भीष्म -  भ्रम इन विकारो का उदगम है अंत तक जीवित रहता है इसलिए पितामह है , समूची सेना मर गयी ये जीवित था शारशेयै पर अचेत था फिर भी जीवित था| ये है भ्रम रूपी भीष्म, भ्रम अंत तक रहता है| इसी प्रकार विजतिया कर्म रूपी कर्ण तथा संग्राम विजयी कृपIचIर्या है | साधना अवस्था में साधक द्वारा कृपा का आचरण ही कृपाचार्या है | भगवान क्रिपाधान है और प्राप्ति के बाद सद का भी वही स्वरूप है किंतु साधन काल में जबतक हम अलग है परमात्मा अलग है , विजातिया प्रवित्ती जीवित है , मोह्मयि घेराव है ऐसी परस्थिति में साधक यदि कृपा का आचरण करता है तो वो नष्ट हो जाता है| गोस्वामी तुलसीदास का भी यही मत है - माया अनेक विघ्न करती है रिद्धियाँ प्रदान करती है यहाँ तक की सिद्ध बना देती है , ऐसी अवस्था वाला साधक बगल से निकल भर जाए मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा, वो भले ठीक हो जाए पर साधक उसे अपनी देन मान बैठे तो नष्ट हो जाएगा | एक रोगी के स्थान पर हज़ारो रोगी घेर लेंगे, भजन चिंतन का क्रम अवरुद्ध हो जाएगा और उधर बहकते - बहकते प्रकृति का बाहुल्या हो जाएगा| यदि लक्ष्य दूर है और साधक कृपा करता है तो कृपा का अकेला आचरण ही समूची सेना को जीत लेगा इसलिए साधक को पूर्तिपर्यंत इससे सतर्क रहना चाहिए | इसी प्रकार आसक्ति रूपी अस्वस्थामा, विकल्प रूपी विकर्ण है ये सभी बहिरमुखी प्रवाह के नायक है|

अब कौन सी सेना किन भावों द्वारा सुरक्षित है ----

दुर्योधन कहता है " भीष्म द्वारा संरक्षित हमारी सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगो की सेना जीतने में सुगम है" 

 पर्याप्त और अपर्याप्त जैसे श्रेष्ठ शब्दो का प्रयोग दुर्योधन की आशंका को व्यक्त करता है अतः देखना है की भीष्म कौन सी सत्ता है जिसपर कौरव निर्भर करते हैं और भीम कौन सी सत्ता है जिसपर दैवी संपन्न संपूर्ण पांडव निर्भर हैं |

दुर्योधन अपनी व्यवस्था देता है- " सब मोर्चो पर अपनी अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सब के सब भीष्म की सब ओर से रक्षा करे , यदि भीष्म है तो हम अजेय हैं इसलिए आप केवल भीष्म की ही रक्षा करे"

 

कैसा योद्धा है भीष्म जो स्वयं अपनी रक्षा नही कर पा रहा है, कौरवों को उसकी रक्षा व्यवस्था करनी पड़ रही है , ये कोई वाह्या योद्धा नही भ्रम ही भीष्म है  जब तक भ्रम जीवित है तब तक विजIतिया प्रवित्तिया कौरव अजेय है | अजेय का ये अर्थ नही की जिसे जीता ही ना जा सके बल्कि अजेय का अर्थ दुर्जय है जिसे कठिनाई से जीता जा सकता हो |

"महा अजय संसार रिपु , जीती सकाई सो वीर" 

यदि भ्रम समाप्त हो जाए तो अवीद्या अस्तित्वहीन हो जाए, मोह इत्यादि जो आंशिक रूप से बचे भी है शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे | भीष्म की इच्छामृत्यु थी, इच्छा ही भ्रम है , इच्छा का अंत और भ्रम का मिटना एक ही बात है| इसी को संत कवीर ने सरलता से कहा -

इच्छा काया इच्छा माया , इच्छा जाग उपजाया |

कह कवीर जे इच्छा विवर्जित , ता का पार ना पाया|

आरंभ मे इच्छाए अनंत होती है और अंततोगत्वा पर्माप्ति प्राप्ति की इच्छा शेष रहती है जब ये इच्छा भी पूरी हो जाती है तब इच्छा भी मिट जाती है |  यदि उससे भी बड़ी कोई वस्तु होती तो आप उसकी इच्छा अवस्य करते, जब उसके आगे कोई वास्तु है ही नही तो इच्छा किसकी होगी और इच्छा के मिटते ही भ्रम का सर्वथा अंत हो जाता है यही भीष्म की इच्छा मृत्यु है|

भाव रूपी भीम " भावे विद्यते देवह" भाव में वो क्षमता है की अविदित परमात्मा भी वीदित हो जाता है | श्री कृष्ण ने इसे श्रद्धा कह कर संबोधित किया है| भाव मे वो क्षमता है की भगवान को भी वश में कर लेता है| भाव से ही संपूर्ण पुण्यमयी

प्रवित्ती का विकास है , ये पुण्य का संरक्षक है , है तो इतना बलवान की परम देव परमात्मा को संभव बनता है किंतु इतना कोमल भी है की आज भाव है तो कल अभाव मे बदलते देरी नही लगती. ईष्ट मे लेश मात्र भी त्रुटि होने पर भाव डगमगा जाता है, पुण्यमयी प्रवित्ती विचलित हो उठती है , ईष्ट से संबंध टूट जाता है इसलिए भीम द्वारा रक्षित इन लोगो की सेना जीतने में सुगम है |

                                                     भागवत गीता 2
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दिल्ली में आज सुबह एक और धमाका . . . . (India behind the lens )

दिल्ली में आज सुबह एक और धमाका
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दिल्ली में आज सुबह एक बार फिर मदर डेरी ने दूध पर २ रूपये बढाये, लाखो लोग इस धमाके में घायल हुए, हालांकि अभी तक किसी आतंकी दल ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है परन्तु घायलों ने कांग्रेसी दल का हाथ बताया है

घायलों ने कांग्रेसी दल का हाथ बताने की वजह बताते हुए कहा की इस धमाके में प्रयोग किया गया पदार्थ "मेहेंगाई" है जो की इस दल का एक मुख्य घातक तत्त्व रहा है लोगो का कहना है कि ये दल पिछले ८ सालो में ऐसे धमाके पहले भी करता रहा है
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रविवार, 3 अप्रैल 2011

गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा , आँचल का हो सार तुम्हारा |

निर्मल पावन कोमल शीतल ,
कैसा है स्पर्श तुम्हारा |
तन मन की कैसी पीड़ा हो ,
हर लेता है प्यार तुम्हारा |

जब भी जीवन में थकता हूँ ,
तेज धुप में मैं तपता हूँ |
जीवन का हर ताप मिटाता
आँचल का इक सार तुम्हारा |

मुझे खिला तुम भूखे रहती ,
ढाल बनी सब सुख दुःख सहती |
शब्दों में ना कह पाउँगा ,
अकथनीय है प्यार तुम्हारा |

बचपन में जब बाल खींचकर ,
जब - जब मैंने तुमको मारा |
तब - तब तुमने शीश चूमकर ,
जाने तुमने कितना दुलारा |
कैसे भूल सकूँगा माँ मैं ,
निश्छल वो दुलार तुम्हारा |

मन में अब अभिलाषा एक ,
चाहे मिले जन्म अनेक |
गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा ,
आँचल का हो सार तुम्हारा |
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