रविवार, 3 अप्रैल 2011

गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा , आँचल का हो सार तुम्हारा |

निर्मल पावन कोमल शीतल ,
कैसा है स्पर्श तुम्हारा |
तन मन की कैसी पीड़ा हो ,
हर लेता है प्यार तुम्हारा |

जब भी जीवन में थकता हूँ ,
तेज धुप में मैं तपता हूँ |
जीवन का हर ताप मिटाता
आँचल का इक सार तुम्हारा |

मुझे खिला तुम भूखे रहती ,
ढाल बनी सब सुख दुःख सहती |
शब्दों में ना कह पाउँगा ,
अकथनीय है प्यार तुम्हारा |

बचपन में जब बाल खींचकर ,
जब - जब मैंने तुमको मारा |
तब - तब तुमने शीश चूमकर ,
जाने तुमने कितना दुलारा |
कैसे भूल सकूँगा माँ मैं ,
निश्छल वो दुलार तुम्हारा |

मन में अब अभिलाषा एक ,
चाहे मिले जन्म अनेक |
गोंद तुम्हारी , प्यार तुम्हारा ,
आँचल का हो सार तुम्हारा |
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3 टिप्‍पणियां:

  1. मन को अच्छी लगी ,बहुत सुन्दर रचना ,बंधुवर !
    लिखते रहिये .आप की कविता में गेयता कारन पढने में बड़ा ही आनंद आता है .

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद मार्मिक कविता। दिल को छूने वाली मां की याद दिलाने वाली।

    उत्तर देंहटाएं

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