शनिवार, 17 सितंबर 2011

भागवत गीता - २

भागवत गीता 1
भगवत गीता - २ अभी तक आपने सेना का विस्तार और योद्धाओं का वर्णन पढ़ा  अब आगे पढ़े ...............
युद्ध प्रारंभ होने से पहले सब लोगो ने शंख ध्वनि की | जो ह्रदय के सर्वश्व  ज्ञाता है उन कृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाया | विकराल रूप से बहकती हुई इन्द्रियों को समेट कर उन्हें अपने सेवक के श्रेणी में खड़ा कर देना ह्रदय से प्रेरित सद्गुरु की दें है | श्री कृष्ण एक योगेश्वर सद्गुरु थे | 

दैवी संपत्ति को अधीन करने वाला अनुराग ही अर्जुन है | इष्ट के अनुरूप लगाव जिसमे विरह, वैराग्य, अश्रुपात हो , " गदगद गिरा नयन बह नीरा " रोमांच हो | इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषय वास्तु का लेश मात्र टकराव न होने पाए उसी को अनुराग कहते हैं | यदि ये सफल होता है तो परम देव परमात्मा में प्रवेश दिलाने वाली दैवी संपत्ति पर आधिपत्य कर लेता है इसी का दूसरा नाम धनञ्जय भी है , एक धन तो बाहरी संपत्ति है जिससे शारीर निर्वाह की व्यवस्था होती है आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, इससे परे स्थिर आत्मिक संपत्ति ही  निज संपत्ति है | ब्रिह्दारंन्य उपनिषद में य्ग्यवाल्क्य ने मैत्त्रेय को यही समझाया की धन से संपन्न पृथ्वी के स्वामित्व को भी अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती , उसका उपाय आत्मिक संपत्ति है | 

भयानक कर्म वाले भीमसेन से पौण्ड्र अर्थात प्रीत नामक महा शंख बजाया | भाव का उद्गम और निवास स्थान ह्रदय है |  आपका भाव लगाव बच्चे में होता है किन्तु वस्तुतः वो लगाव आपके ह्रदय में है जो बच्चे में जाकर मूर्त होता है | ये भाव अथाह और महान बलशाली है उसने प्रीति नामक महा शंख बजाया | भाव में ही वो प्रीति निहित है इसलिए भीम ने पौण्ड्र - प्रीति नामक शंख बजाया | भाव महान बलवान है किन्तु प्रीति के माध्यम से - " हरि व्यापक सर्वत्र समाना , प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना "|

कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंत विजय नामक शंख बजाया | यद्धे स्थिरः सह युधिष्ठिरः -  प्रकृति पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में स्थिर रहता है महान दुःख से भी विचलित नहीं होता है तो एक दिन जो अनंत है जिसका अंत नहीं है वो है परमतत्व पर्ममता,उसपर विजय दिला देता है |नियम रूपी नकुल ने शुघोश नमक शंख बजाया , ज्यों - ज्यों नियम उन्नत होगा अशुभ का शमन होता जायेगा , शुभ घोषित होता जायेगा | सत्संग रूपी सहदेव ने  मणिपुष्पक शंख बजाया |  मनीषियों ने प्रत्येक श्वाश को मणि की संज्ञा दी है , " हीरा जैसी श्वासा बातो में बीती जाए " |

शिखा सूत्र का त्याग ही शिखंडी है | शिखा लक्ष्य का प्रतीक है जिसे आपको पाना है और सूत्र है संस्कारों का | जब तक आगे परमात्मा का पाना शेष है , पीछे संस्कारों का सूत्रपात लगा हुआ है , तब तक त्याग कैसा ,संन्यास कैसा ,अभी तो चलने वाले पथिक है | जब प्राप्तव्य प्राप्त हो जाए , पीछे लगे हुए संस्कारों की डोर कट जाए , ऐसी अवस्था में सर्वथा भ्रम शांत हो जाता है  इसलिए शिखंडी ही भ्रम रूपी भीष्म का विनाश करता है |  

संयम रूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया  की हे राजन ! उसके उपरान्त वैराग्य रूपी हनुमान , वैराग्य ही ध्वज है जिसका और ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना  जाता है , कुछ लोग कहते है ध्वजा चंचल थी इसलिए कपि - ध्वज कहा गया किन्तु यहाँ कपि साधारण बन्दर नहीं , स्वयं हुनमान थे , जिन्होंने मान अपमान का हनन किया था | प्रकृति की देखि सुनी वस्तुओं से , विषयों से राग का त्याग ही वैराग्य है अतः वैराग्य ही जिसकी ध्वजा है उस अर्जुन ने व्यवस्थित रूप से ध्रितराष्ट्र पुत्रों को देखकर शास्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर श्री कृष्ण से ये बचन कहा की मेरे रथ को दोनों सेनाओ के बीच में खड़ा करे | यहाँ सारथी को दिया गया आदेश नहीं बल्कि इष्ट से की गयी प्रार्थना है | जब तक मैं युद्ध की कमाना वालों को अच्छी प्रकार देख न लूँ की इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है | दुर्बुद्धि दुर्योधन का कल्याण चाहने वाले जो  - जो ये राजा युद्ध में आये हैं उन युद्ध करने वालों को मैं देखूंगा इसलिए रथ को दोनों सेनाओ के बीच में खड़ा करें |

संजय उवाच !
      अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ह्रदय के ज्ञाता श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओ के बीच में उत्तम रथ को खड़ा करके कहा की  " हे पार्थ , इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख "|  इसके उपरान्त अर्जुन ने उन दोनों सेनाओं में स्थित पिता के भाइयों को , पितामहों को , आचार्यों को , मामाओं को , भाइयों को , पुत्रों को , पौत्रों को , मित्रों को और सुह्रिदयों को देखा | दोनों सेनाओं में अर्जुन को केवल अपने परिवार के लोग ही दिखाई पड़े | प्रचिलित गणना के अनुसार अठारह अक्छोहिणी जो की ढाई - पौने तीन अरब के लगभग होता है  , इतना बड़ा जनसमूह अर्जुन का परिवार मात्र था | क्या इतना बड़ा भी किसी का परिवार होता है ? कदापि नहीं ! ये ह्रदय देश का चित्रण है |

 इस प्रकार खड़े हुए उन संपन्न बंधुओं को देखर अर्जुन अत्यंत करुणा से आवृत्त होकर बोला - 
 हे कृष्ण ! इस युद्ध की इच्छा वाले खड़े हुए स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं , मुख सुखा जाता है और मेरे शारीर में रोमांच हो रहा है , इतना ही नहीं - हाँथ से गांडीव गिरता है , त्वचा भी जल रही है " | अर्जुन संतप्त हो उठा की ये कैसा युद्ध है जिसमें स्वजन ही खड़े हैं अर्जुन को भ्रम हो गया  वो कहता है " अब मैं खड़ा रहने में भी अपने को असमर्थ पा रहा हूँ , अब आगे देखने की सामर्थ्य नहीं है | हे केशव इस युद्ध का लक्षण भी बिपरीत ही देखता हूँ युद्ध में अपनों को मारकर परम कल्याण भी नहीं देखता हूँ , कुल को मारने से कल्याण कैसे होगा ? हे श्री कृष्ण मैं विजय नहीं चाहता , राज्य तथा सुख भी नहीं चाहता हमें इनसे क्या प्रयोजन है ? हमें जिनके लिए राज्य , भोग  सुखादि इच्छित है वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं , हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकर , किन्तु जब सब के सब प्राणों की आशा त्यागकर युद्ध के लिए खड़े है तो मुझे राज्य अथवा भोग नहीं चाहिए , ये सब इन्हीं के लिए था इनसे अलग होने पर हमें इनकी आवश्यकता नहीं है | हे मधुसुदन मैं तीन लोक के 
राज्यों के लिए भी मैं इन सबको मरना नहीं चाहता फिर पृथ्वी के लिए कहना ही क्या ! |

अठारह अक्छोहिणी सेना में अर्जुन को अपने स्वजन ही दिखाई देते है , इतने अधिक स्वजन वास्तव में क्या हैं ? वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है | भजन के आरम्भ में प्रत्येक अनुरागी के समक्ष येही समस्या रही है , सभी चाहते हैं की हम भजन करे , उस परम सत्य को पा ले , किन्तु किसी अनुभवी सद्गुरु के संरक्षण में कोई अनुरागी जब क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ के संघर्ष को समझता है की हमें किनसे लड़ना है तो वो हताश हो जाता है, वो चाहता है की सब लोग साथ रहे सभी सुखी रहे और इन सबकी व्यवस्था करते हुए भी हम परमात्मा स्वरूप की प्राप्ति भी कर ले | किन्तु जब वो समझता है की आराधना में अग्रसर होने के लिए परिवार छोड़ना होगा , इन संबंधो का मोह समाप्त करना होगा तो वो अधीर हो उठता है | केवल अर्जुन ही अधीर था ऐसी बात नहीं है | अनुराग सबके ह्रदय में होता है, प्रत्येक अनुरागी अधीर होता है उसे सम्बन्धी याद आने लगते हैं | पहले वो सोचता था की भजन से कुछ लाभ होगा तो ये सब सुखी होंगे , इनके साथ रहकर ये सब भोगेंगे | जब ये साथ ही नहीं रहेंगे तो सुख लेकर क्या करेंगे | अर्जुन की दृष्टि राज्य सुख तक ही सीमित थी , वो त्रिलोकी के साम्राज्य को ही सुख की पराकाष्ठा समझता था | इसके आगे भी कोई सत्य है इसकी जानकारी अर्जुन को अभी नहीं है |

वो कहता है  -" हे जनार्दन !  ध्रितराष्ट्र के पुत्रों को भी मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी , जहां ध्रितराष्ट्र अर्थात धृष्टता का राष्ट्र है उससे उत्पन्न मोह रूपी दुर्योधन को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ? इन आततायिओं को मारकर हमें पाप ही तो लगेगा"

 जो जीवन यापन के तुच्छ लाभ के लिए अनीति अपनाता है वो आततायी कहलाता है किन्तु इससे भी बड़ा आततायी वो है जो आत्मा के पथ में अवरोध उत्पन्न करता है | आत्मदर्शन में बाधक काम , क्रोध , मोह , लोभ आदि का समूह ही आततायी है | 

अर्जुन कहता है - हे जनार्दन ! कुल नाश से होने वाले दोषों को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यूँ नहीं विचार करना चाहिए ?  मैं ही पाप करता हूँ ऐसी बात नहीं , आप भी भूल करने जा रहे है !
कृष्ण पर भी आरोप लगाया ! अभी वो समझ में अपने को कृष्ण से कम नहीं मानता | प्रत्येक नया साधक  , सद्गुरु के शरण जाने पर इसी प्रकार तर्क करता है और अपने को जानकारी में कम नहीं समझता | येही अर्जुन भी कहता है की ये भले न समझे किन्तु हम आप तो समझदार हैं कुल नाश के दोषों पर हमें विचार करना चाहिए |

 कुलनाश में दोष क्या है ? - कुल के नाश होने से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं धर्म के नष्ट होने पर संपूर्ण कुल को पाप भी बहुत दबा लेता है | हे कृष्ण पाप के अधिक बच जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्ण-संकर उत्पन्न होता है | अर्जुन की मान्यता थी की कुल की स्त्रियों के दूषित होने से वर्ण - संकर होता है किन्तु श्री कृष्ण ने इसका खंडन करते हुए आगे बताया की मैं अथवा स्वरुप में स्थित महापुरुष यदि आराधना क्रम में भ्रम उत्पन्न कर दे तब वर्ण - संकर होता है | वर्ण संकर के दोषों पर अर्जुन प्रकाश डालता है - वर्ण - संकर कुलघाती और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है , लुप्त हुई पिंड क्रिया वाले इनके पितर लोक भी गिर जाते है , वर्तमान नष्ट हो जाता है ,अतीत के पितर गिर जाते है और भविष्य वाले भी गिरेंगे | इतना ही नहीं - इन वर्ण - संकर करक दोषों से कुल और कुलघातियों का सनातन कुल धर्म और जाती धर्मं नष्ट हो जाते हैं | अर्जुन मानता था की कुल धर्म सनातन है , कुल धर्म ही शास्वत है किन्तु श्री कृष्ण ने इसका खंडन किया और आगे बताया की आत्मा ही सनातन धर्म है | वास्तविक सनातन धर्म को जानने से पहले  मनुष्य धर्म के नाम पर किसी न किसी रुढी को जानता है |    
                                              जारी .................................................
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