शनिवार, 1 अगस्त 2009

खाली प्याला धुंधला दर्पण

खाली प्याला धुंधला दर्पण

मन में एक अजब सी उदासी
मेरी आँखें कब से प्यासी
कैसा तेरा है ये समर्पण

खाली प्याला धुंधला दर्पण

कब से चाहूं तुझसे मिलना
मेरे दिल का दिल में जलना
कैस ये सावन का पतझड

खाली प्याला धुंधला दर्पण

चली गयी तु झलक दिखाकर
मेरे दिल में आग लगाकर
तेरा कैसा ये आकर्षँण

खाली प्याला धुंधला दर्पण
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2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम कि अभिव्यक्ति, और समर्पण के भावः लिए हुए आपकी कविता सुन्दर लगी..

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  2. bhut hi ache se hriday ki vedna ko vyakt kiya h...

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