शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

मन के निर्झर बन में , क्यों पुष्प नए खिल जाते

मन के निर्झर बन में , क्यों पुष्प नए खिल जाते.
भंवरे की गुंजन सी कहती खुच बीती बिस्म्रित बातें.

मधुमय मोहमयी थी , मन बहलाने की क्रीड़ा.
अब हृदय हीला देती है , वह मधुर प्रेम की पीडा.

जिस छन देखा मैंने तुमको, बस गयी वो छवी आँखों में.
खिंची लकीर हृदय में , जो अलग रही लाखों में .

जैसे जलनिधि में आकर , किरणे मिलती हैं लहर से ,
वैसा कुछ आभास हुआ , जब नजरें मिली नजर से.

मुखमंडल शशि से सुन्दर , आँचल में चपल चमक सी.
नयनो में श्यामल पुतली, पुतली में श्याम झलक सी.

इन स्याम वॉर्न नयनो में , थी लाखों योवन की लाली.
जैसे मदिरामय हो जाये , संपूर्ण गगन की प्याली.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जैसे जलनिधि में आकर , किरणे मिलती हैं लहर से ,
    वैसा कुछ आभास हुआ , जब नजरें मिली नजर से.
    ye to bahut khoob likh diya aapne/ mujhe lagata he yahi is poori rachna ki jaan he/
    badhai

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