रविवार, 8 अगस्त 2010

चोट से मत ब्यथित हो मन

चोट से मत ब्यथित हो मन
चोट खा - खा के ही पत्थर मूर्ति का आकर लेता
इस धरा पर अर्चना का निज कई आधार देता
नित नया अवतार हो तुम
अडिग रह , ना धैर्य खो मॅन

निज हाथ में ले तुलिका ब्रह्मांड मे नवरंग भर दे
नये अक्षर नये स्वर से इक नयी उमंग भर दे
तुम रहो मौलिक भी ऐसे
जैसे खुद का हो सृजन

जाति भेद से जलते जग मे समता भाव की ब्रिष्टि कर दे
मलयाचल मंद सुगंध पवन हो ऐसी सुंदर सृष्टि कर दे
तुम भी सुंदर बन लो ऐसे
जैसे कोई हो आकर्षण

नभ से उँचे उठ कर के तुम अपनी पहचान बनो
परिवर्तन के साथ चलो तुम इतना गतिमान बनो

लो अतीत से केवल उतना
जितना तुमको हो पोषण
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2 टिप्‍पणियां:

  1. नभ से उँचे उठ कर के तुम अपनी पहचान बनो
    परिवर्तन के साथ चलो तुम इतना गतिमान बनो
    -प्रेरणा देती अच्छी कविता

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