मंगलवार, 22 नवंबर 2011

एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ

जड़ जग के उपहार सभी हैं,
धार आँसुओं की बिन वाणी,
शब्द नहीं कह पाते तुमसे
मेरे मन की मर्म कहानी,


उर की आग, राग ही केवल
कंठस्थल में लेकर चलता,

एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ

जान-समझ मैं तुमको लूँगा--
यह मेरा अभिमान कभी था,
अब अनुभव यह बतलाता है--
मैं कितना नादान कभी था;


योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
विवश उसे तुम दुहराओगे?

बहुत यही है अगर तुम्हारे अधरों से परिचित हो जाऊँ।
एक यही अरमान गीत बन, प्रिय, तुमको अर्पित हो जाऊँ
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जान-समझ मैं तुमको लूँगा--
    यह मेरा अभिमान कभी था,
    अब अनुभव यह बतलाता है--
    मैं कितना नादान कभी था;
    bahut sundar aur sateek baat kahti badhiya rachna samay mile kabhi to aaiyegaa meri post par aapka svagat hai http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/11/blog-post_20.html

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  2. योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
    विवश उसे तुम दुहराओगे?
    बहुत सुंदर प्रेममयी रचना बधाई......

    उत्तर देंहटाएं
  3. योग्य कभी स्वर मेरा होगा,
    विवश उसे तुम दुहराओगे?...

    सुन्दर गीत !

    उत्तर देंहटाएं
  4. उर की आग, राग ही केवल
    कंठस्थल में लेकर चलता,

    सुंदर कविता

    उत्तर देंहटाएं

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